भाग्य रचयिता के औज़ार – संस्कार !

भाग्य रचयिता के औज़ार – संस्कार !

हर आत्मा के अपने संस्कार होते हैं- सात्विक, तामसिक, राजसी। सभी आत्माएं / प्रत्येक व्यक्ति अपने इन्ही गुणों के अनुसार व्यवहार करते हैं। ये गुण भी प्रकृति से ही मिलते हैं और प्रकृति ईश्वर की रचना हैं। इसलिए प्रकृति द्वारा दिए गए  संस्कारों का फल हैं उसका व्यवहार !

संस्कार राजसी, तामसिक, सात्विक हो सकते हैं। व्यक्ति के स्वभाव में इन में से किसी की प्रधानता हो सकती हैं।

व्यक्ति का व्यवहार उसके स्वभाव से ही नियंत्रित होता हैं, सही बात हैं।

कोई भी आत्मा अपने संस्कार ले के आती हैं, ये भी सही हैं।

संस्कार आत्मा को मिलते नहीं हैं, आत्मा इन्हें अर्जित करती हैं और आगे के जन्मों में अपने इन्हीं अर्जित संस्कारों को अपने साथ ले आती हैं।

१. आत्मा के मूल संस्कार –

आत्मा के मूल संस्कार हैं जो उस परमात्मा का अंश होने से हमें मिले हैं। ये मूल संस्कार हैं प्रेम, करुणा, पवित्रता, शांति, ज्ञान, शक्ति और आनंद। ये हमारे मूल गुण है और यही कारण हैं कि इन गुणों के प्रति हम स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। अपने आस पास के लोगों में इन्ही गुणों को खोजते हैं… जिनमे ये गुण मिले उनका साथ हमें अच्छा लगता हैं।

पर अलग अलग लोगों के संपर्क में आते आते… अलग अलग तरह की परिस्थितियों का सामना करते करते हम इन मूल गुणों से दूर होते जाते है और हम पर कई अलग गुणों की परत चढ़ने लगती हैं। नए संस्कार बनने लगते हैं और दृढ़ होने लगते हैं… बरसो बरस… जन्मों जन्मों तक जीने का ढंग बन जाते हैं ये नए संस्कार।

ये संस्कार बहुत गहरे भी होते है और इनका बदलना ही सर्वाधिक कठिन भी होता है। इन्ही ले कर आये हुए संस्कारों के कारण हमें अपने बच्चों में ऐसी ऐसी आदतें भी दिखती हैं जो हमारे में नहीं होती और न ही हमारे परिवार के वातावरण से मेल खाती हैं। हैरान परेशान परिवारजन ये कहते हुए मिल जाते हैं कि हमारे जैसी तो कोई बात नहीं इस बच्चे में ! जाने ये ऐसा क्यों हैं…? जाने कैसे संस्कार ले कर आया हैं ये ! ईश्वर ने भी तरह तरह के लोग बनाये हैं !

तो क्या ये सभी संस्कार से ईश्वर “ मिलते हैं ” ?

— नहीं !

कैसे अर्जित करती हैं आत्मा इन संस्कारों को आइये देखते हैं –

२. माता पिता / परिवार से –

बच्चा जब जन्म लेता है तो सबसे पहले वह अपने परिवार के संपर्क में आता हैं। माँ, पिता और अन्य परिजन जो उसी घर में रहते हैं उनके व्यवहार को बच्चा देखता हैं, समझता हैं, और यही से वह “सही और गलत” की परिभाषा गढ़ता हैं ! याद रखिये बच्चों को नैतिकता का पाठ किताबों से नहीं पढ़ाया जा सकता बल्कि स्वयं उदहारण बन कर सिखाया जाता हैं।

किसी अनचाहे मेहमान के आने पर क्या आप बच्चे से कहलवा देते हैं की पापा घर पर नहीं है?

काम को टालने के लिए क्या आप फ़ोन पर अपने अफसर को तबियत ठीक न होने का बहाना बना कर परिवार/दोस्तों के साथ घूमने जाने का कार्यक्रम बना लेते हैं?

कुछ मांगने आये पड़ोसी को झूठ बोल देते हैं की फलां चीज तो आपके घर भी ख़तम हो गयी हैं ?

अपनी गलती से टूटी हुई वस्तु भी दुकानदार को ये कह कर लौटाने का प्रयास करते हैं की वह तो टूटी हुई ही निकली थी पैकेट से?

कोई गलती हो जाने पर दोष किसी और के माथे मढ़ देते हैं और परिवार के सामने बच्चे को भी (कोई प्रलोभन दे कर) अपना गवाह बना लेते हैं ?

इन में से बहुत से और ऐसे ही न जाने कितने ही झूठ हम अपने बच्चों के सामने हर रोज बोल रहे होते हैं और सिखा रहे होते है उन्हें की अपने फायदे के लिए / अपनी गलती की ज़िम्मेदारी लेने से बचने के लिए थोड़ा बहुत झूठ तो चलता हैं।

अब वह अपनी परिस्थितियों में इसका उपयोग करना आरम्भ करता हैं।

स्कूल न जाने के लिए वह कहेगा उसके पेट में दर्द हैं,

जो टिफ़िन आप उसे स्कूल के लिए देतीं हैं और पूरा नहीं खाने पर आप डांटती हैं तो उस डांट से बचने के लिए वह खाने को फेंक देगा और खाली टिफ़िन ही घर लाएगा, आपसे कहेगा कि खा लिया था।   

होमवर्क पूरा न हो तो टीचर के सामने तरह तरह के बहाने बनाएगा, परखेगा की कौनसा बहाना सबसे अधिक कारगर साबित होता हैं और फिर उस तरह के बहानों का इस्तेमाल किया करेगा।

झूठ बोल कर कई अनचाही परिस्थितियों से बचा जा सकता हैं ये उसने सीख लिया। पहले पहले इसका इस्तेमाल वह आवश्यकता पड़ने पर करता हैं, फिर आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभी नहीं, बल्कि अक्सर, सिर्फ अपनी “सुविधा” के लिए वह झूठ बोलने लगता हैं क्योंकि वह जानता हैं –

मुश्किलों से बचाये – झूठ

ज़िम्मेदारियों से बचने के काम आये – झूठ   

मेहनत से बचाये  – झूठ

अब झूठ बोलने के लिए बड़ी वजह की आवश्यकता नहीं रही, जरा जरा सी बात पर झूठ तैयार ही रहता हैं।

कभी कभी का व्यवहार बार बार दोहराने से अब “आदत” बन जाता हैं !

जीवन में इस आदत के चलते काम बनते चले गए… व्यक्ति इस आदत को अपनी “कुशलता” समझने लगता हैं। अब यह उसकी व्यवहार शैली बन चुका हैं।  व्यवहार शैली यानि “स्वभाव” !

इतनी पक्की आदत और उस आदत के प्रति स्वयं के सकारात्मक रवैये के चलते इस स्वभाव की जड़ें मन पर बहुत-बहुत गहरीं जम जाती हैं।

इन्ही गहरीं जड़ों को संस्कार कहते हैं !

झूठ बोलने का संस्कार बन गया ! सारा जीवन बहुत झूठ बोला और ऐसा करने में कुछ गलत कर रहें हैं ये कभी नहीं स्वीकारा बल्कि इसे अपनी कुशलता (स्मार्टनेस) समझा। अब आत्मा जब शरीर छोड़ेगी तो इस गहरे संस्कार को अपने साथ ले जाएगी और जब नया शरीर धारण करेगी तो इसे साथ ही ले भी आएगी !

और हम कहेंगे, “प्रकृति ने दिया है ये संस्कार !” और प्रकृति ईश्वर ने रची है इसलिए ईश्वर ने दिया हैं ये संस्कार !

  क्या वाकई 🙂 ?

३. सामाजिक जीवन से अर्जित संस्कार –

घर में बड़े ही शांतिपूर्ण वातावरण में पला बढ़ा बच्चा। घर में कोई भी क्रोधी स्वभाव का नहीं था, बालक स्वयं भी गुस्सा नहीं किया करता था। उच्च शिक्षा प्राप्त करके अब वह एक मल्टी नेशनल कंपनी में मैनेजर बन गया। काम का दबाव बहुत हैं, स्वयं मेहनती होना काफी नहीं हैं अपने अधीन कर्मचारियों से समय सीमा में काम करवाना भी उतना ही जरूरी हैं पर ये तो जरूरी नहीं की सभी कर्मचारी मेहनती हों, सभी अपने कार्य को गंभीरता से लेते हों, सभी में अच्छा काम करने की लगन हों, सभी अनुशासित हों।

पर काम तो सभी से लेना हैं और दी गयी समयावधि में कर के भी दिखाना हैं। ऐसे में धैर्य चुकने लगता हैं, कोई मित्र/शुभचिंतक सलाह भी दे देता हैं कि ऐसे शांति से कहोगे तो कोई नहीं सुनेगा। थोड़ी सख्ती बरतो, नरम लहज़ा छोड़ो गुस्सा दिखाओ। आपसे डरेंगे तभी काम करेंगे वर्ना बहाने ही सुनते रह जाओगे सबसे।

आप गुस्से और सख्त लहज़े को अपनाना शुरू करते हैं, शुरू शुरू में थोड़ी दिक्कत होती हैं। आप सख्ती सिर्फ उन्ही कर्मचारियों पर दिखातें हैं जिनके बारे में आपका अनुभव हैं की वे काम में ढिलाई बरतते हैं। परिणाम सकारात्मक मिलने शुरू हो जाते हैं। काम समय पर होने लगा, आपका मन जान गया कि शांति से कहने में बहुत समय व्यर्थ हो रहा था। काम का दबाव आप पर भी बढ़ रहा हैं और इसीलिए अब आप कोई छंटनी नहीं करते की किस से कैसे बात करनी हैं। सामने वाले के मन में अपना डर बैठाओ और काम लो यही सही तरीका हैं। दिन के १०-१२ घंटे इसी तरह से व्यवहार करने वाला व्यक्ति थक कर जब देर शाम घर लौटेगा तो क्या अपने उस सख्त व्यवहार के आवरण को दरवाजे पर ही छोड़ के अंदर आयेगा? शुरू के कुछ दिनों तक…  शायद हाँ, पर रोज रोज का व्यवहार, आवरण तभी तक हैं जब तक की वह आदत न बन जाये और एक बार आदत बन जाये तो आदतें तो हर पल साथ ही रहती हैं। “धैर्य” छोड़ कर जिसने “क्रोध” अपनाया हैं तो पति या पिता किसी भी रूप में धैर्य अब उसके पास नहीं हैं। अब उसे अपने पूछी गयी बात का उत्तर, कहे गए काम का क्रियान्वन तुरंत चाहिए !  लंबे समय तक चली आदत ने अब स्वभाव का रूप ले लिया हैं !

“जो डरते हैं वे विरोध नहीं करते ” और काम तुरंत हो जाता हैं। ये सफलता पूर्वक आजमाया हुआ नुस्खा उसकी आदत, फिर उसकी व्यवहार शैली… फिर स्वभाव बन गया  और जीवन भर के स्वभाव और उस स्वभाव को ‘सही’ समझने का मनोभाव उसे संस्कार बना देता हैं। संस्कारों की जड़े बहुत गहरीं होती हैं….  इतनी गहरी की वे आत्मा के साथ एक से दूसरे जन्म तक चले आते हैं ! और अगले जन्म में किसी परिवार को मिलेगा एक गुस्सैल बच्चा जो जरा जरा सी बात पर धैर्य खो देता हैं और नज़र आएंगे हैरान से माता पिता की हमारा बच्चा ऐसा क्यों हैं !!

४. आत्मशक्ति (willpower) से अर्जित संस्कार –

ये अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार हैं। ये वे संस्कार हैं जिन्हें हम अपनी आत्मशक्ति (willpower) का इस्तेमाल कर के अर्जित करते हैं। अपने विवेक से जांचते हैं, परखते हैं कि नैतिक रूप से क्या सही हैं और क्या गलत। किसी भी स्वार्थ और सुविधा से ऊपर उठ कर “सही” को चुनते हैं और फिर उस “सही” को अपने व्यवहार का अंग बनाते हैं। व्यवहार में आया कार्य एक दिन आदत, आदत से स्वभाव और स्वभाव से संस्कार बन जाता हैं।

घर-दफ्तर की व्यस्तता, दिन भर बैठे बैठे कंप्यूटर पर काम करना, और देर रात तक t.v. / मोबाइल पर नज़रे गड़ाए रहना और मन-मस्तिष्क में ढेर सारा तनाव ले के सो जाना और सुबह फिर उसी ढर्रे पर जिंदगी को डाल देना, नतीजा? एक दिन हेल्थ रिपोर्ट आती हैं कि आप डायबिटिक होने के कगार पे हैं ! अब दो विकल्प हैं,

1. जो जैसा चल रहा हैं वैसा ही चलने दे और दवाइयां लेनी शुरू कर दे।

2. अपनी दिन चर्या और आदतों में बड़ा परिवर्तन लाएं, व्यायाम को अपनी दिनचर्या में जगह दें, खान पान को ले के सजग हो जाएँ।

नियति ने परिस्थिति उत्पन्न की और भाग्य ने दो विकल्प सामने रख दिए,  निर्णय हमारे ही हाथ में हैं-

विकल्प 1. -“बहुत व्यस्त हूँ मेरे पास कहाँ समय है व्यायाम का ? दिन भर इतना का करो और फिर अपना मनपसंद खाना भी न खाओ ये तो मुझसे नहीं होगा। डॉक्टर साहब जो दवाई देनी हैं दे दो मैं ले लूंगा”. दवा शुरू हो गयी और उम्र भर के लिए आप उस दवा पर निर्भर हो गए। शरीर के अन्य अंगों पर उस दवा के साइड इफेक्ट्स आएंगे इसके लिए कुछ अन्य दवाएं भी शुरू हो गयीं और जिनकी दवा सम्भव नहीं थी उन दिक्कतों की आदत डाल ली।

विकल्प 2. – सुबह जल्दी उठना शुरू करूँगा और 30 मिनट योग करूँगा। भोजन अब सही समय पर और सही तरीके से होगा। चाहे कुछ हो जाये इस रोग को अपने शरीर में मैं जड़ें नहीं ज़माने दूंगा।  अटल निश्चय ! दृढ इच्छाशक्ति! 

और नतीजा? महीने भर में शुगर का स्तर तो सामान्य आया ही साथ ही चुस्ती फुर्ती और तनाव रहित मस्तिष्क भी मानों बोनस में मिल गया ! अब यह दिनचर्या और भोजन संबंधी आदतें जीवन का हिस्सा बन गयी। जीवन भर की ऐसी आदतें स्वभाव बन जाती हैं। आपने देखा होगा सुबह सुबह हर मौसम में भी कुछ वृद्धजन सैर करना नहीं छोड़ते, ये पुरानी आदतें है जो अब उनका स्वभाव हैं और इस शरीर को छोड़ने के बाद उनकी आत्मा इस “संस्कार” को अपने साथ ले जाएगी और कंही किसी परिवार में जन्म लेगा कोई ऐसा बच्चा जिसमें शुरू से सेहत के प्रति जागरूकता होगी, आलस्य उसके स्वभाव में कहीं नज़र नहीं आएगा।

नियति हमारे सामने परिस्थितियां ले कर आएगी। कोई शक्ति, कोई तरीका नहीं की वे परिस्थितियां हमारे आगे आये ही ना। वे तो आनी ही है पर हमारे हाथ में है हमारी  प्रतिक्रिया। हम चाहे तो पुराने संस्कारों के वशीभूत हुए व्यवहार करते रहें और चाहें तो अपने विवेक से काम लें, अपनी इच्छाशक्ति का इस्तेमाल करें, और अपना भाग्य रच लें।

नियति अटल हैं… सामने आना हैं वो आएगा ही तो ज्योतिष की क्या भूमिका रह गयी फिर ? सारे मन्त्र.. पूजा पाठ.. व्रत-उपवास.. रत्न… किसलिए ? जानेंगे अगले आलेख में  🙂